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पितृदोष कैसे दूर करें


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पूर्वजों का अपमान करने से पितृ ऋण बनता है, शास्त्रों के अनुसार पितृ दोष Pitr dosh से पीड़ित कुंडली शापित कुंडली मानी जाती है।
ऐसे व्यक्ति जो अपने माता पिता या अपने मातृपक्ष अर्थात मामा-मामी मौसा-मौसी, नाना-नानी या पितृपक्ष अर्थात दादा-दादी, चाचा-चाची, ताऊ-ताई आदि को दुखी करते है और उनका तिरस्कार करते है उनकी कुंडली में अगले जन्म में पितृ दोष Pitr dosh होता है। इसलिए यह जानना अति आवश्यक है कि पितृ दोष कैसे दूर करें, Pitradosh kaise dur karen ।

पितृ दोष Pitr dosh के कारण व्यक्ति को जीवन में बहुत अधिक अस्थिरता का सामना करना पड़ता है उसके काम बनते बनते बिगड़ जाते है, उसे समाज में अपयश का सामना करना पड़ता है। परिवार में कलह होने के साथ-साथ संतान का ना होना या संतान की ओर से कष्ट या संतान का स्वास्थ्य खराब रहना आदि परेशानी का सामना करना पड़ता है।

पितर दोष के कारण जातक या उसके परिजनों को कई असाध्य रोग भी हो जाते है, घर के सदस्यों को कर्ज, मुक़दमे का सामना करना पड़ता है ।
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व्रहन्याराशरहोरा शास्त्र तथा पुराणों में भी कई स्थानों पर पितृ दोष Pitra Dosh का वर्णन मिलता है। तमाम कथाएं एवं उदाहरण है जो बताते है कि पित्तरों के संतुष्ट ना होने के गम्भीर परिणाम हुये है ।
तथा जो लोग अपने पित्तरों के प्रति आदर श्रद्धा एवं उनका स्मरण करते है तथा उनके निमित धर्मानुसार श्राद्ध एवं धार्मिक कर्त्तव्यों का पालन करते है उनका जीवन सुख समृद्धि Shukh Samridhi सफलता एवं यश से परिपूर्ण होता है।
जीवन में हर मुश्किल समय में यह पित्तर उनकी सहायता करते है तथा अदृश्य रक्षा कवच के रूप में यह अपने वंशजो की रक्षा भी करते है।
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पितृ दोष Pitradosh जो व्यक्ति के जीवन में श्राप की तरह होता है वह आशीर्वाद के रूप में भी बदल सकता है। समान्यतः इस युग में ज्यादातर मनुष्यों पर उसके पित्तरों का ऋण होता है, इससे बचने के लिये हमें अपने माता पिता गुरूजनों तथा अन्य बड़े बुजर्गों को सदैव आदर देकर उन्हे संतुष्ट रखना चाहिये।
अपने पित्तरों के प्रति हमेशा श्रद्धा एवं कृतज्ञता का भाव रखना चाहिये।
अपने वंश के समस्त पित्तरों का श्राद्ध Pitron ka Shardh एवं तर्पण Tarpan करना चाहिये। प्रत्येक अमावस्या को गाय को पांच फल खिलायें अथवा अमावस्या को पित्तरों के नाम से अपनी सामर्थनुसार अन्न कपड़े एवं बर्तनों का दान निर्धनों को दें।

भोजन से पहले अपनी रोटी से चौथाई रोटी निकाल कर उसे गाय तथा चिड़िया को खिलायें।
प्रत्येक मनुष्य चाहे वह किसी भी धर्म को मानने वाला क्यों ना हो उसे अपने घर में किसी भी शुभ,नवीन एवं धार्मिक कार्य करते समय पित्तरों का स्मरण करके उनसे आशीर्वाद अवश्य ही लेना चाहिये ।
प्रत्येक मौसम में आने वाला नया फल भी अपने पूर्वजों के नाम से किसी भी निर्धन व्यक्ति को या धार्मिक स्थल में अवश्य ही देना चाहिये।
हर अमावस्या के दिन घर पर पितरों के निमित एक ब्राह्मण को भोजन कराकर उसे दक्षिणा देकर उनसे आशीर्वाद लें । इससे पितृ प्रसन्न होते है, घर से कलह दूर रहती है, कार्यो में सफलता मिलती है।

अवश्य जानिए दीपावली के दिन क्या करें जिसे पूरे वर्ष होती रहे धन की वर्षा, दिवाली की दिनचर्या,
चूँकि परिवार के किसी भी सदस्य का पितृ दोष Pitra Dosh से पीड़ित होने पर उसका प्रभाव पूरे परिवार पर ही पडता है अतः यह सभी मनुष्यों का पुनीत कर्त्तव्य है कि वे अपने समस्त ज्ञात अज्ञात पूर्वजों के प्रति आदर एवं श्रद्धा का भाव रखते हुये उनका स्मरण करते रहें।
जिस प्रकार एक भौतिक शरीर को भोजन, पानी, हवा, घर, परिवार, कपड़े, शिक्षा स्नेह एवं तमाम भौतिक सुख सुविधाओं की आवश्यकता होती है उसी प्रकार सूक्ष्य शरीर को भी आदर, श्रद्धा, कृतज्ञता, स्मरण, श्राद्ध Shradh,तर्पण Tarpan, धार्मिक तथा अध्यात्मिक क्रियाओं की अनिवार्य आवश्यकता होती है।

जिस प्रकार एक पिता अपने पुत्र को स्नेह, शिक्षा देते हुये उसके बचपन की तमाम खुशियों का ध्यान रखता है तथा एक पुत्र के लिये उसका पिता ही समस्त आशाओं का केन्द्र एवं देवदूत होता है उसी प्रकार हमारे पूर्वजों के लिये भी उनका वंशज ही समस्त आशाओं का केन्द्र होता है।
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पितृदोष क्या है


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वह दोष Dosh जो पित्तरों से सम्बन्धित होता है पितृदोष Pitradosh कहलाता है। यहाँ पितृ Pitra का अर्थ पिता नहीं वरन् पूर्वज होता है। ये वह पूर्वज होते है जो मुक्ति प्राप्त ना होने के कारण पितृलोक में रहते है तथा अपने प्रियजनों से उन्हे विशेष स्नेह रहता है। श्राद्ध या अन्य धार्मिक कर्मकाण्ड ना किये जाने के कारण या अन्य किसी कारणवश पितृ रूष्ट हो जाये तो उसे पितृ दोष Pitradosh कहते है।
विश्व के लगभग सभी धर्मों में यह माना गया है कि मृत्यु के पश्चात् व्यक्ति की देह का तो नाश हो जाता है लेकिन उनकी आत्मा कभी भी नहीं मरती है। पवित्र गीता के अनुसार जिस प्रकार स्नान के पश्चात् हम नवीन वस्त्र धारण करते है उसी प्रकार यह आत्मा भी मृत्यु के बाद एक देह को छोड़कर नवीन देह धारण करती है।
पित्तरों के अस्तित्व एवं महत्व का लगभग समस्त धर्मों में उल्लेख प्राप्त हुआ है। हमारे पित्तरों को भी सामान्य मनुष्यों की तरह सुख दुख मोह ममता भूख प्यास आदि का अनुभव होता है।
यदि पितृ योनि में गये व्यक्ति के लिये उसके परिवार के लोग श्राद्ध कर्म तथा श्रद्धा का भाव नहीं रखते है तो वह पित्तर अपने प्रियजनों से नाराज हो जाते है।
समान्यतः इन पित्तरों के पास आलौकिक शक्तियां होती है तथा यह अपने परिजनों एवं वंशजों की सफलता सुख समृद्धि के लिये चिन्तित रहते है जब इनके प्रति श्रद्धा तथा धार्मिक कर्म नहीं किये जाते है तो यह निर्बलता का अनुभव करते है तथा चाहकर भी अपने परिवार की सहायता नहीं कर पाते है तथा यदि यह नाराज हो गये तो इनके परिजनों को तमाम कठनाइयों का सामना करना पड़ता है।
पितृ दोष, Pitradosh होने पर व्यक्ति को जीवन में तमाम तरह की परेशानियां उठानी पड़ती है जैसे :
घर में सदस्यों का बिमार रहना
मानसिक परेशानी
सन्तान का ना होना कन्या का अधिक होना
पुत्र का ना होना
पारिवारिक सदस्यों में वैचारिक मतभेद होना
जीविकोपार्जन में अस्थिरता
पर्याप्त आमदनी होने पर भी धन का ना रूकना
प्रत्येक कार्य में अचानक रूकावटें आना
सर पर कर्ज का भार होना
सफलता के करीब पहुँचकर भी असफल हो जाना
प्रयास करने पर भी मनवांछित फल का ना मिलना
आकस्मिक दुर्घटना की आशंका
वृद्धावस्था में बहुत दुख प्राप्त होना आदि।
बहुत से लोगों की कुण्डली में कालसर्प Kaal Sarp योग भी देखा जाता है वस्तुतः कालसर्प योग भी पितृ दोष के कारण ही होता जिसकी वजह से मनुष्य के जीवन में तमाम मुसीबतों एवं अस्थिरता का सामना करना पड़ता है।

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पितरों का महत्व


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संसार के समस्त धर्मों में कहा गया है कि मरने के बाद भी जीवात्मा का अस्तित्व समाप्त नहीं होता है वरन वह किसी ना किसी रूप में बना ही रहता हे। जैसे मनुष्य कपड़ों को समय समय पर बदलते रहते है उसी तरह जीव को भी शरीर बदलने पड़ते है जिस प्रकार तमाम जीवन भर एक ही कपड़ा नहीं पहना जा सकता है उसी प्रकार आत्मा अनन्त समय तक एक ही शरीर में नही ठहर सकती है।
ना जायते म्रियते वा कदाचिन्नाय भूत्वा भविता वा न भूपः ऊजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे

गीता.2ए अध्याय.20

अर्थात आत्मा ना तो कभी जन्म लेती है और ना ही मरती है मरना जीना तो शरीर का धर्म है शरीर का नाश हो जाने पर भी आत्मा का नाश नहीं होता है। विज्ञान के अनुसार कोई भी पदार्थ कभी भी नष्ट नहीं होता है वरन् उसके रूप में परिवर्तन हो जाता है।
पितृ हमारे ही कुल के पूर्वजो की आत्माए है जो ईश्वर को प्यारे हो चुके है। यह पितृ लोक में वास करती है पर इनकी आसक्ति हमारे घर के सभी सदस्यों पर होती है।
गरूड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के पश्चात आत्मा प्रेत रूप में यमलोक की यात्रा शुरू करती है। सफर के दौरान संतान द्वारा प्रदान किये गये पिण्डों से प्रेत आत्मा को बल मिलता है। यमलोक में पहुंचने पर उस आत्मा को अपने कर्मानुसार प्रेत योनी में ही रहना पड़ता है अथवा अन्य योनी प्राप्त होती है।
हिन्दू धर्म में पितरों को देवताओं के समान पूजनीय बताया गया है। शास्त्रों के अनुसार चन्द्रमा के ऊपर एक अन्य लोक है जो पितर लोक कहलाता है। जैसे मनुष्य मनुष्य लोक में रहता है वैसे ही पुण्य आत्माए पितृ लोक में रहती है। पितृ लोक के ऊपर सूर्य लोक है एवं इनसे उपर स्वर्ग लोक है।
गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि वह पितरों में अर्यमा नामक पितृ हैं। अर्थात पितरों की पूजा करने से भगवान श्री कृष्ण / भगवान विष्णु की ही पूजा होती है।
विष्णु पुराण के अनुसार सृष्टि की रचना के समय ब्रह्मा जी के पीठ से पितर उत्पन्न हुए। पितरों के उत्पन्न होने के बाद ब्रह्मा जी ने अपने उस शरीर को त्याग दिया था । पितर को जन्म देने वाला ब्रह्मा जी का शरीर संध्या बन गया, इसलिए पितर संध्या के समय शक्तिशाली होते हैं।
हर व्यक्ति के तीन पूर्वज पिता, दादा और परदादा क्रम से वसु, रुद्र और आदित्य पितृ के समान माने जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध के वक़्त वे ही अन्य सभी पूर्वजों के प्रतिनिधि होते हैं।
क्या आप जानते है कि पितृ पक्ष अश्विन माह में ही क्यों आते है दरअसल हमारा एक माह चंद्रमा का एक अहोरात्र होता है। इसीलिए ऊर्ध्व भाग पर रह रहे पितरों के लिए कृष्ण पक्ष उत्तम होता है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार पृथ्वी लोक में देवता उत्तर गोल में विचरण करते हैं और दक्षिण गोल भाद्रपद मास की पूर्णिमा को चंद्रलोक के साथ-साथ पृथ्वी के नज़दीक से गुजरता है।
पितृ पक्ष की प्रतीक्षा हमारे पूर्वज पूरे वर्ष करते हैं। वे चंद्रलोक के माध्यम से दक्षिण दिशा में पितृ पक्ष में अपने घर के दरवाज़े पर पहुँच जाते है और अपने वंशजो से अपने निमित तर्पण, श्राद्ध, दान-पुण्य, अपना सम्मान पाकर प्रसन्नतापूर्वक अपनी नई पीढ़ी को अपना शुभ आर्शीवाद देकर चले जाते हैं।
शास्त्रों में पितरो को देवताओं से भी अधिक दयालु और कृपालु कहा गया है। शास्त्रों के अनुसार हमारे पितृ पितृपक्ष में तर्पण और श्राद्ध द्वारा वर्ष भर तृप्त रहते हैं। मान्यता है कि जिस घर में पूर्वजों का श्राद्ध होता है वह घर पितरों द्वारा सदैव हर आपदाओं से सुरक्षित रहता है।
व्यक्ति के सत्संस्कार होने के बाद यही अक्षय आत्मा पित्तर रूप में क्रियाशील रहती है तथा अपनी आत्मोन्नति के लिये प्रयासरत रहने के साथ पृथ्वी पर अपने स्वजनों एवं सुपात्रों की मदद के लिये सदैव तैयार रहती है।
पित्तरों के प्रति श्रृद्धा उनका स्मरण एवं उचित संस्कार करने से हमें सदैव पित्तरों से लाभ ही मिलता है। पित्तर वह उच्च आत्माएं होती है जो अपने स्वभाव एवं संस्कार के कारण दूसरों की यथासम्भव सहायता करती है। हिन्दु धर्म ग्रंथो में पितरों को संदेशवाहक भी कहा गया है|
शास्त्रों में लिखा है………….. ॐ अर्यमा न तृप्यताम इदं तिलोदकं तस्मै स्वधा नम:।ॐ मृर्त्योमा अमृतं गमय||

अर्थात, अर्यमा पितरों के देव हैं, जो सबसे श्रेष्ठ है उन अर्यमा देव को प्रणाम करता हूँ ।
हे! पिता, पितामह, और प्रपितामह। हे! माता, मातामह और प्रमातामह आपको भी बारम्बार प्रणाम है । आप हमें मृत्यु से अमृत की ओर ले चलें। इसका अर्थ है कि हम पूरे वर्ष भर अपने देवों को समर्पित अनेकों पर्वों का आयोजन करते हैं, लेकिन हममे से बहुत लोग यह महसूस करते है की हमारी प्रार्थना देवों तक नही पहुँच प़ा रही है। हमारे पूर्वज देवों और हमारे मध्य एक सेतु का कार्य करते हैं,और जब हमारे पितृ हमारी श्रद्धा, हमारे भाव, हमारे कर्मों से तृप्त हो जाते है हमसे संतुष्ट हो जाते है तो उनके माध्यम से उनके आशीर्वाद से देवों तक हमारी प्रार्थना बहुत ही आसानी से पहुँच जाती है और हमें मनवांछित फलों की शीघ्रता से प्राप्ति होती है ।
पित्तरों का सूक्ष्म जगत से सम्बन्ध होने के कारण यह अपने परिजनों स्वजनों को सतर्क करती रहती है तथा तमाम कठनाइयों को दूर कराकर उन्हें सफलता भी दिलाती है। समान्यतः यह सर्वसाधारण को अपनी उपस्थिति का आभास भी नहीं देते है परन्तु उपर्युक्त मनोवृर्ति एवं व्यक्तित्व को देखकर यह उपस्थित होकर भी सहयोग एवं परामर्श देते है।
पित्तरों का उद्देश्य ही अपने वंशजों को पितृवत स्नेह दुलार सहयोग एवं खुशियां प्रदान करना है संसार में तमाम उदाहरण उपलब्ध है जब इन्होंने दैवीय वरदान के रूप में मदद की है।

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सूर्य ग्रह का प्रभाव – सूर्य ग्रह के उपाय 


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र्य ग्रह Surya Grah का शुभाशुभ प्रभाव एवं सूर्य ग्रह के उपाय Surya Grah Ke Upay ——-

सूर्य ग्रह Surya Grah : सूर्य ग्रह Surya Grah पिता, आत्मा समाज में मान, सम्मान, यश, कीर्ति, प्रसिद्धि, प्रतिष्ठा का करक होता है। इसकी राशि है सिंह।
यदि किसी इंसान के जन्म समय पर सूर्य की कमजोर स्थिति होती है तो सूर्य के अशुभ फल, surya ke ashubh phal, के कारण जीवन भर उसका भाग्य डांवाडोल ही रहता है।
सूर्य ग्रह Surya Grah की अशुभ भावों में मौज़ूदगी से सूर्य के अशुभ फल, surya ke ashubh phal, जातक से पद-प्रतिष्ठा, वैभव, संपत्ति आदि छीन लेते है।

ऐसे में उचित ज्योतिष के सूर्य ग्रह के उपाय ( surya grah ke upay ) का प्रयोग करना चाहिए ताकि सूर्य के सकारात्मक प्रभाव को बढ़ाकर जिंदगी में सफलता पाई जा सके।
कुंडली में अशुभ सूर्य ( ashubh surya ) होने पर आपको पेट, आँख, हृदय का रोग हो सकता है। अशुभ सूर्य ( ashubh surya ) होने पर सरकारी कार्य में भी बाधाएं उत्पन्न होती है।
कुंडली में अशुभ सूर्य ( ashubh surya ) का लक्षण यह है कि मुँह में बार-बार बलगम इकट्ठा हो जाता है,बोलते समय कई बार थूक भी उछल जाता है, तथा आपके आत्मबल की कमी होती है।
सूर्य के अशुभ फल, surya ke ashubh phal, के कारण सामाजिक हानि, अपयश, मन का दुखी या असंतुष्ट होना,घर में भैंस या लाल गाय हो तो उस पर संकट आता है।
सूर्य के अशुभ फल, surya ke ashubh phal, के कारण पिता से विवाद या वैचारिक मतभेद बने रहते है।
किन्तु जब आपकी कुंडली में ucch ka surya, उच्च का सूर्य, होता है, तो वह समाज में मान-सम्मान और नौकरी व कामकाज में स्थायित्व दिलाता है। ucch ka surya, उच्च का सूर्य, पिता का पक्ष मजबूत करता है और सरकारी कार्यों में भी किसी प्रकार की कोई बाधा या परेशानी नहीं आती।
जानिए, उल्टी दस्त में तुरंत आराम के अचूक उपाय,

सूर्य गृह को अनुकूल बनाने के उपाय

यदि आपकी कुंडली में भी अशुभ सूर्य, ashubh surya है अर्थात सूर्य कमजोर है तो निम्नलिखित सूर्य ग्रह के उपाय, Surya grah ke upay करके सूर्य ग्रह Surya grahको मजबूत बनायें–

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सूर्य यंत्र :– सूर्य ग्रह के शुभ फलो हेतु सूर्य यंत्र को धारण करना चाहिए। इससे अज्ञान, दरिद्रता, भय, अपमान के योग दूर होते है, जातक को तेज, ज्ञान, सुख-सौभाग्य, धन और यश की प्राप्ति होती है।
इस भोज पत्र पर केसर से अनार की कलम से लिख कर ताम्बे या स्वर्ण के ताबीज में भरकर लाल सूती या लाल रेशमी धागे में बांध कर रविवार को शुभ समय में गले या बाँह में धारण करना चाहिए। एवं इस यंत्र को नित्य देखकर पढ़ना चाहिए।
औषधि स्नान :– सूर्य ग्रह को अपने अनुकूल करने के लिए रविवार के दिन प्रात: जल में इलाइची, केसर, मुलेठी, लाल रंग के सुगन्धित पुष्प या रोली डालकर स्नान करने से सूर्य ग्रह के अनुकूल फल मिलते है।
सूर्य तांत्रिक मन्त्र :– ऊँ हृां हृीं सः सूर्याय नमः।।
सूर्य पौराणिक मन्त्र :– ऊं घृ‍णिं सूर्याय नमः ।।
उपरोक्त दोनों मंत्रो में से किसी भी एक मन्त्र का विधिवत जाप कराने से सूर्य देव के अशुभ फल निश्चय ही दूर होते है। सूर्य मन्त्र की कम से कम 7000 एवं अधिकतम 28000 जप पूर्णतया फलदाई होता है।

सूर्य देव के दान :– यदि कुंडली में सूर्य ग्रह अशुभ फल दे रहे हो तो रविवार के दिन प्रात: 10 बजे से पूर्व माणिक्य, गेंहू, गुड़, केसर, ताम्रपत्र, घी, लाल चन्दन, लाल वस्त्र, लाल पुष्प आदि किसी सात्विक ब्राह्मण को पूर्ण श्रद्धा से दक्षिणा सहित दान चाहिए, इससे सूर्य ग्रह के अशुभ फल दूर होते है, शुभ फल मिलने लगते है।
सूर्य ग्रह को मजबूत करने, sury grah ko majbut karne के लिए पिता की सेवा और उन्हें सम्मान देना चाहिए। पैर छूकर पिता का आशीर्वाद लें।

सूर्य ग्रह के उपाय, surya grah ke upay में सूर्य को जल चढ़ाना और विष्णु भगवान की पूजा करना श्रेष्ठ होता है।
सूर्य ग्रह को अनुकूल surya grah ko anukul करने के लिए बहते पानी में गेहूं और बाजरा प्रवाहित करने और मुंह मीठा कर घर से निकलने से भी सूर्य का प्रभाव सकारात्मक होता है।
सूर्य ग्रह के उपाय, surya grah ke upay में रविवार का व्रत करें, एवं नित्य भगवान श्री राम की आराधना करे।
सूर्य को प्रसन्न करने के उपाय, surya ko prasann karne ke upay में श्रेष्ठ है की रविवार को आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करे, एवं नित्य सूर्य देव को आर्घ्य दे, गायत्री मंत्र का जाप करे।
सूर्य को प्रसन्न करने के उपाय, surya ko prasann karne ke upay के लिए रविवार की दिन ताँबा, गेहूँ एवं गुड का दान करें। प्रत्येक कार्य का प्रारंभ मीठा खाकर करें।
ताबें के एक टुकड़े को काटकर उसके दो भाग करें। एक को पानी में बहा दें तथा दूसरे को जीवन भर साथ रखें।
सूर्य ग्रह को अनुकूल करने के लिए मंत्र (surya grah ko anukul) : ” ॐ ह्री ह्रौं सूर्याय नमः” या “ॐ घृणि सूर्याय नमः” का 108 बार (1 माला) जाप करे|
रविवार को सूर्य के नक्षत्रों में सूर्य ग्रह शांति, sury grah shanti हेतु मदार की समिधा (लकड़ी) आदि से हवन करवाना शुभ होगा।

सूर्य ग्रह शांति, sury grah shanti के लिए ताम्बे के गोल टुकड़े पर केशर लगाकर गुलाबी वस्त्र में लपेटकर रविवार को अपने जन्म स्थान से पूर्ण दिशा में जाकर सूर्योदय के समय निर्जन स्थान में दबाना शुभ होगा।

नित्य निम्नलिखित सूर्य के चमत्कारी 21 नाम स्मरण करने से मिलते है चमत्कारी लाभ —–
(1.) ॐ विकर्तन (2.) ॐ विवस्वान (3.) ॐ मार्तण्ड (4) ॐ भास्कर (5) ॐ रवि (6.) ॐ लोकप्रकाशक (7.) ॐ श्रीमान (8) ॐ लोकचक्षु (09) ॐ गृहेश्वर (10) ॐ लोकसाक्षी (11) ॐ त्रिलोकेश (12) ॐ कर्ता (13) ॐ हर्ता (14) ॐ तमिस्त्रहा (15) ॐ तपन (16) ॐ तापन (17)ॐ शुचि (18) ॐ सप्ताश्ववाहन (19) ॐ गभस्तिहस्त (20) ॐ ब्रह्मा (21) ॐ सर्वदेवनमस्कृत

नोट —-
उच्च या बलवान ग्रह का रत्न धारण करे एवं नीच या कमजोर ग्रह को दान ,जप,एवं होम आदि से बली बनाये।
यदि आपकी कुंडली में सूर्य नीच का या कमजोर होकर स्थित हो तो सूर्य का ग्रह कभी न धारण करें यदि बली होकर स्थित है तो किसी ज्योतिषी से सलाह लेकर रत्न की प्राण प्रतिष्ठा कराकर शुभ समय में धारण करे शुभ रहेगा ।

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नाम के पहले अक्षर से जानिए स्त्री या पुरुष की राशि और खास बातें


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प्रत्येक व्यक्ति के नाम के पहले अक्षर से उसकी राशि का पता चलता है | वैसे जातक के जन्म के समय पर ग्रहो के हिसाब से उसकी राशि का निर्धारण होता है और उस राशि के अनुसार ही नाम रखना शुभ माना जाता है लेकिन आजकल लोग पहले से ही अपने बच्चो के नाम सोच लेते है |
बरहाल जिस नाम से किसी को बुलाया जाता है, जो नाम किसी के स्कूल आदि में होता है, जिस नाम से जातक सोते में पुकारे जाने पर उठ जाता है , जिस नाम से समाज में उसकी पहचान होती है उसी नाम के पहले अक्षर से उसकी राशि होती है |
हर राशि की खास विशेषताएं होती है और हर व्यक्ति पर उसकी राशि का बहुत अधिक प्रभाव होता है अत: किसी के बारे में जानना है तो उसके नाम के पहले अक्षर से, नाम के अनुसार खास बातें जाना जा सकता है |
नाम के पहले अक्षर के अनुसार किसी स्त्री – पुरुष के स्वभाव , उसकी मित्र-शत्रु राशियाँ, उसके अनुकूल ग्रह, देवता, शुभ दिन शुभ रंग अर्थात नाम के अनुसार पुरुषों/ स्त्रियों की खास बातो को जान सकते है |
जानिए नाम के अनुसार , राशिनुसार पुरुषों /स्त्रियों की खास बातें,

मेष राशि……

मेष राशि – चू, चे, चो, ला, ली, लू, ले, लो, आ ।
राशि स्वरूप – मेंढा जैसा, राशि स्वामी मंगल, अग्नि तत्व: उग्र स्वभाव, अल्प संतति वाला।
मित्र-राशियाँ – सिंह, तुला और धनु राशियाँ इनकी मित्र होती है ।
शत्रु-राशियाँ – मिथुन, कन्या राशि ।
राशि-रत्न – मूंगा रत्न ।
अनुकूल-रंग – लाल, पीला, गेरुआ ।
शुभ-दिन – मंगलवार, रविवार, वृहस्पतिवार ।
अनुकूल-देवता:- शिवजी, भैरव जी, श्री हनुमान जी,
अनुकूल-ग्रह:- सूर्य, वृहस्पति, चन्द्र,
व्रत उपवास:- मंगलवार
अनुकूल अंक :- 9,
अनुकूल तारीखें:- 9, 18, 27,
सकारात्मक तथ्य:- कुटुम्ब को पालने वाले, चुनौती को स्वीकार करने वाले, सदैव क्रियाशील,
नकारात्मक तथ्य:- दम्भी,
दिशा:- पूर्व,
इस राशि के लोगों की प्रकृति – मेष राशि के लोग नेतृत्व के स्वभाव से भरे होते है , इनमेँ कोई भी निर्णय शीघ्रता से लेने की क्षमता होती है । मेष राशि के लोगो को दक्षिण-पूर्व दिशा से लाभ प्राप्त होता है , यह प्रेम में विश्वास रखते है । यह किसी राजनेता के साथी/ मित्र हो सकते है । यह अग्नि तत्व तथा रक्त वर्ण वाले होते है।

वृष राशि….

वृष राशि – ई, ऊ, ए, ओ, वा, वी, वू, वे, वो ।
राशि स्वरूप – बैल जैसा, राशि स्वामी- शुक्र, भूमि तत्व, रजो गुणी, दृढ़ शरीर ।
मित्र राशियां:- कुम्भ तथा मकर,
शत्रु राशियां:- सिंह, धनु और मीन,
राशि प्रकृति व स्वभाव:- ज्यादातर सौम्य स्वभाव वाले होते है.
राशि रत्न:- हीरा,
अनुकूल रंग:- श्वेत और नीला,
शुभ दिवस:- शुक्रवार, शनिवार तथा बुधवार,
अनुकूल देवता:- श्री लक्ष्मी जी और श्री सरस्वती देवी जी,
व्रत उपवास:- शुक्रवार,
अनुकूल अंक:- 6,
अनुकूल तारीखें:- 6, 15, 24,
सकारात्मक तथ्य:- गुरु-भक्त, कृतग्य, दयालु,
नकारात्मक तथ्य:- दुराग्रही, कानो का कच्चा, आलसी,
दिशा:- दक्षिण,
इस राशि के लोगों की प्रकृति – इस राशि के लोग उपभोगवादी होते है । इनकी जिंदगी विलासिता से परिपूर्ण होती है। यह बहुत ही मेहनती होते है तथा अपनी कार्यक्षमता के दम पर सदैव आगे बढ़ने वाले होते है ।
इन्हे उत्तर दिशा से विशेष लाभ होता है अर्थात उत्तर दिशा इंनके लिये भाग्यशाली होतीं है। यह कामेच्छा रखने वाले होते है। यह अपने संबंधियों में प्रिय होते है। यह बुद्धिमान और दूरदर्शी होते है।

मिथुन राशि….

मिथुन राशि – का, की, कू, घ, ङ, छ, के, को, ह ।
राशि स्वरूप – स्त्री-पुरुष आलिंगनबद्ध, राशि स्वामी- बुध, वायु तत्व: तमो गुणी, मध्यम कामी ।
मित्र राशियां:- तुला, सिंह, कन्या, कुम्भ,
शत्रु राशियां:- कर्क, वृष, मेष,
प्रकृति:- क्रूर स्वभाव, धातु प्रकृति,
राशि रत्न:- पन्ना,
अनुकूल रंग:- हरा,
शुभ दिन:- बुधवार,
अनुकूल देवता:- गणपति, मां सरस्वती, मां दुर्गा जी,
व्रत-उपवास:- बुधवार,
अनुकूल अंक:- 5,
अनुकूल तारीखें:- 5, 14, 23,
अनुकूल वर्ष:- 21, 30, 39, 48, 57, 66, व 75वां वर्ष अत्यंत महत्वपूर्ण,
व्यक्तित्व:- चतुर, निडर, बुद्धिमान,
सकारात्मक तथ्य:- कुशल व्यापारी, वाक् पटु,
नकारात्मक तथ्य:- निर्मोही, आत्मकेंद्रित, निष्ठुर,
दिशा:- पश्चिम,
इस राशि के लोगों की प्रकृति – इस राशि के लोग ललित कलाओं जैसे संगीत, गायन और चित्रकला में रुचि रखने वाले होते हैं। ये बाते बहुत बढ़िया बना लेते है, वाद विवाद / तर्क में ये प्रवीण होते है । ये किसी से भी अपनी बात मनवा ही लेते है।
वैसे तो ये मिलनसार होते है लेकिन कभी-कभी असहज भी महसूस करते है । इन्हे घूमना फिरना, पार्टियाँ देना बहुत पसन्द होता है।

कर्क राशि……

कर्क राशि – ही, हू, हे, हो, डा, डी, डू, डे, डो ।
राशि स्वरूप – केकड़ा, राशि स्वामी- चंद्रमा, जल तत्व- उग्र स्वभाव, अल्प संतति वाला, शीघ्र कामी ।
मित्र राशियां:- वृश्चिक, मीन, तुला,
शत्रु राशियां:- मेष, सिंह, धनु, मिथुन, मकर, व कुम्भ,
अनुकूल रत्न:- मोती, मूंगा,
अनुकूल रंग:- सफेद, क्रीम,
शुभ दिन:- सोमवार, मंगलवार, वृहस्पतिवार,
अनुकूल देवता:- शिवजी, गौरी,
व्रत-उपवास:- सोमवार, वृहस्पतिवार,
अनुकूल अंक:- 2,
अनुकूल तारीखें:- 2, 11, 20, 29,
व्यक्तित्व:- अध्ययनप्रिय, जलप्रिय, भावुक, कुशल प्रबंधक,
सकारात्मक तथ्य:- कल्पनाशील, योजनाएं बनाने वाला, वफादार,
नकारात्मक तथ्य:- सदा कोई न कोई रोग, आलस्य, अक्षमशील द्वेषी,
दिशा:- उत्तर,
इस राशि के लोगों की प्रकृति – इस राशि के लोग बहुत जल्दी क्रोध मे आ जाते है इनकी बुद्धि अस्थिर होती है। सामान्यता ये निर्णय लेने में जल्दबाजी कर जाते है लेकिन अन्त मे विजय इन्ही की होती है। ये बदला लेने के लिए किसी भी सीमा तक जा सकते है, जिससे इन्हे परेशानीयों का सामना करना पड़ता है। ये अपने फन में माहिर होते है और अपने कार्य को हर हाल मे अंजाम तक पहुँचाते है।परिश्रम और दृढ़ संकल्प इनके दो बहुत ही ख़ास गुण होते है । इनमें तर्क करने की क्षमता अदभुत होती है। ये किसी भी कार्य में संदेह देखते है।

सिंह राशि……

सिंह राशि – मा, मी, मू, मे, मो, टा, टी, टू, टे ।
राशि स्वरूप :- शेर जैसा, स्वामी – शेर जैसा, स्वामी- सूर्य, प्अग्नि तत्व: रजो गुणी, दृढ़ शरीर, उष्ण प्रकृति, अल्प संतति वाला ।
मित्र राशियां:- मिथुन, कन्या, मेष व धनु,
शत्रु राशियां:- बृषभ, तुला, मकर, कुम्भ,
अनुकूल रत्न:- माणिक्य, मूंगा,
अनुकूल रंग:- चमकीला, श्वेत, पीला, भगवा,
शुभ दिन:- रविवार, बुधवार,
अनुकूल देवता:- भगवान सूर्य,
व्रत उपवास:- रविवार,
अनुकूल अंक:- 1,
अनुकूल तारीखें:- 1, 10, 19, 28,
व्यक्तित्व:- प्रबल पराक्रमी, महत्वाकांक्षी, अधिकारप्रियता,
सकारात्मक तथ्य:- खुले दिलो दिमाग वाला, उदार मन, गर्मजोशी,
नकारात्मक तथ्य:- घमण्डी, अति आत्मविश्वासी, अति महत्व का प्रदर्शन,
दिशा:- पूर्व,
इस राशि के लोगों की प्रकृति – इस राशि के जातक पराक्रमी और तेज से परिपूर्ण होते है।ये बहुत ही बहादुर होते है और हर चुनौती का डटकर सामना करते है । ये किसी भी तरह के निर्णय लेने मे देरी नहीं लगाते है और अपनी नैसर्गिक क्षमता के कारण ये हर जगह अपनी बात मनवा लेते है। ये शीघ्र क्रोध में आ जाते है किंतु उसी तरह शांत भी हो जाते हैं।
इनमें जन्मजात नेतृत्व क्षमता होती है। ये अच्छे लीडर साबित होते है, ये अपनी जबान के बहुत ही पक्के होते है। सिंह राशि के जातक घूमने-फिरने के बहुत शौकीन होते है ।

कन्या राशि……

कन्या राशि – ढो, पा, पी, पू, ष, ण, ठ, पे, पो ।
राशि स्वरूप – कन्या, स्वामी- बुध, भूमि तत्व, तमो गुणी, मध्यम कामी, शीत प्रकृति ।
मित्र राशियां:- मेष, मिथुन, सिंह, तुला,
शत्रु राशि:- कर्क,
अनुकूल रत्न:- पन्ना,
अनुकूल रंग:- हरा,
शुभ दिन:- बुधवार, रविवार, शुक्रवार,
अनुकूल देवता:- गणपति जी, सरस्वती देवी, मां दुर्गा देवी,
व्रत उपवास:- बुधवार,
अनुकूल अंक:- 5,
अनुकूल तारीखें:- 5, 14, 23,
व्यक्तित्व:- दोहरा व्यक्तित्व, विद्वान, आलोचक लेख,
सकारात्मक तथ्य:- निरन्तर क्रियाशीलता, व्यावहारिक ज्ञान,
नकारात्मक तथ्य:- बुराई ढूंढना, कलह प्रियता, अशुभ चिंतन,
इस राशि के लोगों की प्रकृति – इस राशि के जातक शान्त किन्तु चंचल स्वभाव के होते है। ये प्रेम से किसी के भी वश में आ जाते है।सामान्यता ये किसी का भी दिल नहीं दुखाते है।
ये स्वयं के परिश्रम से जीवन मे पर्याप्त सफलता प्राप्त कर लेते है । ये दूरगामी सोच और व्यवस्था परिवर्तन मे विश्वास रखते है। ये अच्छे मित्र,अच्छे सहयोगी और व्यापार मे अच्छे भागीदार साबित होते है ।

Pitra paksh me vishesh

Pitra paksh me vishesh


Pitra paksh me vishesh
Pitra paksh me vishesh

हम सभी का जन्म हमारे माता-पिता के कारण हुआ है, और उनके जन्म के कारण भी उनके माता-पिता ही थे। यही क्रम सृष्टि के आरम्भ से ही चला आ रहा है । मृत्यु के बाद हम अपने पुरखों को पितृ की संज्ञा देते हैं। हिन्दू धर्म में इन्हीं पितरों के लिए वर्ष में एक पक्ष निर्धारित किया जिसे हम पितृ पक्ष Pitra Paksh कहते हैं।

पितृ पक्ष पितरों के प्रति श्रद्धा का समय है। लेकिन कई बार पितृ पक्ष में हम लोगो से गलतियाँ हो जाती है। पितृ पक्ष में विशेष, Pitr paksh me vishesh, रूप से इन बातों का रखे ध्यान,

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इस पक्ष में हम अपने स्वर्गवासी ददिहाल, ननिहाल के पूर्वजों के निमित्त तर्पण Tarpan, श्राद्ध Shradh, दान Daan इत्यादि करते हैं।
कहते है कि पितृ पक्ष Pitra Paksh में पितर धरती में अपने परिजनों के आस पास आ जाते है और उनसे अपने लिए तर्पण Tarpan, श्राद्ध Shradh, ब्राह्मण भोजन Brahman Bhojan, दान आदि के अपेक्षा करते है तथा अपने वंशजो से अपने निमित किये गए कर्मों को स्वीकार कर उन्हें सुख समृद्धि Shukh Samridhi, धन Dhan, यश Yash, आरोग्य Aarogya, आयु, विद्या, और बल प्राप्त करने का आशीर्वाद देते हैं ।

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और यदि उनकी वर्तमान पीढ़ी उनके निमित उपरोक्त कर्म नहीं करती है तो वह रुष्ट होकर उन्हें श्राप दे देते है जिससे उसका जीवन अत्यंत संघर्षमय, कष्टकर हो जाता है।
पितरों Pitron के प्रति अपने कर्मो का निर्वाह करते हुए हमें निम्नलिखित बातों का अवश्य ही ध्यान देना चाहिए ।
पितृ पक्ष में विशेष, Pitr paksh me vishesh,
यह सही है कि पितरों का श्राद्ध Pitron Ka Shradh घर के बड़े बेटे को ही करना चाहिए लेकिन पितरों का तर्पण Pitron Ka Tarpan अर्थात उन्हें जल अन्य पुत्रों को भी देना चाहिए ।
पितृ पक्ष में पितरों का तर्पण Pitron Ka Tarpan नित्य प्रात: अनिवार्य रूप से करना चाहिए । पितृ पक्ष Pitra Paksh में हर वयस्क व्यक्ति को अपने पितरों के प्रति दान पुण्य करते हुए उनके प्रति कर्तज्ञता का भाव अवश्य ही रखना चाहिए ।

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यह हम सभी का कर्तव्य है कि यदि हमारे पिता जीवित है और अज्ञानता वश वह अपने पितरों के लिए सही तरीके से तर्पण श्राद्ध आदि नहीं कर पा रहे है तो हम उन्हें इसके बारे में अवश्य ही बताएं , जिससे उन्हें या परिवार के बाकि सदस्यों को पितृ दोष Pitradosh का भागी ना बनना पड़े ।
पितृ पक्ष Pitra Paksh में श्राद्ध में गाय के दूध, दही और घी का प्रयोग ही करना चाहिए भैंस का नही ।
तर्पण Trapan हमें सुबह सवेरे ही करना चाहिए और तर्पण से पहले कुछ भी ग्रहण नहीं करना चाहिए ।
तर्पण Tarpan, श्राद्ध Shradh, ब्राह्मण भोजन Brahman Bhojan में चाँदी के बर्तनो का उपयोग करना अत्यंत श्रेष्ठ माना जाता है। मान्यता है कि चांदी भगवान शिव के नेत्रों से प्रकट हुई हैं।
शास्त्रों के अनुसार तर्पण में चाँदी के बर्तन से जल देने पर पितरों को अक्षय तृप्ति की प्राप्ति होती है और यदि उनके पिंडदान Pind Daan और ब्राह्मण भोजन Brahman Bhojan में भी चाँदी के बर्तनो का उपयोग किया जाय तो वह अपने वंशजो से अत्यंत प्रसन्न हो जाते है और उन्हें अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है ।
सोने के बर्तनो से तर्पण Tarpan करने से भी महान पुण्य की प्राप्ति होती है ।
सोने और चाँदी के बर्तनो के अभाव में ताम्बे और काँसे के बर्तनो का भी प्रयोग किया जा सकता है लेकिन तर्पण और श्राद्ध Tarpan Aur Shradh में लोहे के बर्तनो का प्रयोग बिलकुल भी नहीं करना चाहिए ।
पितरों के नित्य तर्पण में कुश, काले तिल, गाय का दूध, गंगाजल, तुलसी और दूर्वा का अवश्य ही प्रयोग करना चाहिए । शास्त्रों के अनुसार कुश तथा काला तिल भगवान विष्णु के शरीर से उत्पन्न हुए हैं ।
गाय का दूध और गंगाजल का प्रयोग श्राद्ध के कर्मफल को कई गुना तक बढ़ा देता है। तुलसी और दूर्वा दोनों ही बहुत ही पवित्र मानी जाती है अत: इसके प्रयोग से पितृ अत्यंत प्रसन्न होते हैं।
अवश्य जानिए दीपावली के दिन क्या करें जिसे पूरे वर्ष होती रहे धन की वर्षा, दिवाली की दिनचर्या,
राहुकाल में तर्पण, श्राद्ध वर्जित है अत: इस समय में उपरोक्त कार्य नहीं करने चाहिए ।
श्राद्ध, पिंड दान Pind Daan करते समय साफ पीले या सफ़ेद वस्त्र ही धारण करें, काले, लाल, नीले वस्त्रों का प्रयोग नहीं करना चाहिए ।

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श्राद्ध का अधिकार किसे है, किसे करना चाहिए श्राद्ध,


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हिन्दु धर्म के अनुसार मरणोपरांत संस्कारों को पूरा करने के लिए पुत्र का प्रमुख स्थान माना गया है। शास्त्रों में लिखा है कि पितृ Pitra को नरक से मुक्ति पुत्र द्वारा ही मिलती है इसीलिए पुत्र को ही पितरों के तर्पण, पिंडदान, श्राद्ध का अधिकार, shraddha ka adhikar, दिया गया है। शायद यही कारण है कि हर मनुष्य अपनी मुक्ति और नरक से रक्षा करने के लिए पुत्र की अवश्य ही कामना करता है।
और जो व्यक्ति जान बूझकर या अनजाने में अपने पिता और पितरों के निमित श्राद्ध में तर्पण Shardh Me Tarpan, श्राद्ध Shardh, दान Daan, पिंडदान Pind Daan आदि नहीं करता है उन्हें संतुष्ट नहीं करता है वह घोर नरक का भागी होता है ।

  • लेकिन यदि किसी के पुत्र नहीं है तो क्या होगा ? जानिए शास्त्रों के अनुसार पुत्र न होने पर कौन-कौन अपने पितरों के श्राद्ध का अधिकारी Shradh ka Adhikari हो सकता है
  • शास्त्रों के अनुसार पिता का श्राद्ध Pita Ka Shradh पुत्र को ही करना चाहिए, तभी पिता को मोक्ष और उस पुत्र को पितृ ऋण Pitra Rin से मुक्ति मिलती है ।
  • शास्त्रों के अनुसार पुत्र के न होने पर उस व्यक्ति की पत्नी अपने पति का श्राद्ध कर सकती है।
  • शास्त्रों के अनुसार पुत्र और पत्नी के न होने पर सगा भाई और यदि वह भी नहीं है तो संपिंडों को श्राद्ध करना चाहिए।
  • शास्त्रों के अनुसार एक से अधिक पुत्र होने पर सबसे बड़ा पुत्र श्राद्ध करने का अधिकारी है।
  • शास्त्रों के अनुसार पुत्री का पति एवं पुत्री का पुत्र भी श्राद्ध के अधिकारी हैं।
  • शास्त्रों में यह भी लिखा है कि पुत्र के न होने पर पौत्र या प्रपौत्र को श्राद्ध करना चाहिए ।
  • शास्त्रों में यह भी लिखा है कि पुत्र, पौत्र या प्रपौत्र किसी के भी न होने पर विधवा स्त्री श्राद्ध कर सकती है।
  • शास्त्रों के अनुसार कोई अपनी पत्नी का श्राद्ध तभी कर सकता है, जब उसका कोई पुत्र न हो।
  • शास्त्रों के अनुसार पुत्र, पौत्र या पुत्री का पुत्र न होने पर भतीजा भी श्राद्ध कर सकता है।
  • शास्त्रों में यह भी लिखा है कि इन सब के ना होने पर गोद में लिया पुत्र भी श्राद्ध का अधिकारी है।
  • शास्त्रों के अनुसार किसी के भी ना होने पर राजा को उसके धन से श्राद्ध करने का विधान है।
  • यदि घर का बड़ा लड़का अपने पिता और पूर्वजो का श्राद्ध नहीं करता है और उसके कई पुत्र है तो किसी अन्य पुत्र को यह दायित्व अवश्य ही संभाल लेना चाहिए ।
  • पितृ पक्ष, श्राद्ध और पितरों के महत्व के बारे में बहुत से धर्म शास्त्रों में उल्लेख मिलता है । ‘मनुस्मृति’, ‘याज्ञवलक्यस्मृति’ जैसे धर्म ग्रंथों के आलावा हमारे पुराणों में भी श्राद्ध को अत्यंत महत्वपूर्ण कर्म बताते हुए उसे अनिवार्य रूप से करने के लिए कहा गया है।

‘गरुड़पुराण’ के अनुसार विभिन्न नक्षत्रों में किये गए श्राद्धों का फल निम्न प्रकार मिलता है।

  1. कृत्तिका नक्षत्र में किया गया श्राद्ध जातक की समस्त कामनाओं को पूर्ण करता है।

2 . रोहिणी नक्षत्र में श्राद्ध होने पर संतान का सुख मिलता है ।

3 . मृगशिरा नक्षत्र में श्राद करने से गुणों में वृद्धि होती है ।

4 . आर्द्रा नक्षत्र में श्राद्ध करने से ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है ।

5 . पुनर्वसु नक्षत्र में श्राद्ध करने से जातक को सुंदर शरीर मिलता है ।

6 . पुष्य नक्षत्र में श्राद्ध करने से श्राद्धकर्ता को सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है ।

7 . आश्लेषा नक्षत्र में श्राद्ध करने से जातक निरोगी और दीर्घायु होता है ।

8 . मघा नक्षत्र में श्राद्ध करने से अच्छी सेहत मिलती है ।

9 . पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में श्राद्ध करने से भाग्य प्रबल होता है ।

हस्त नक्षत्र में श्राद्ध करने से ज्ञान, विद्या और बुद्धि की प्राप्ति होती है ।
11 . चित्रा नक्षत्र में श्राद्ध करने से कुल का नाम रौशन करने वाली संतान मिलती है ।

12 .स्वाति नक्षत्र में श्राद्ध करने से व्यापार रोज़गार में आशातीत लाभ मिलता है ।

13 . विशाखा नक्षत्र में श्राद्ध करने से वंश में वृद्धि होती है ।

14 . अनुराधा नक्षत्र में श्राद्ध करने से मान सम्मान मिलता है।

15 . ज्येष्ठा नक्षत्र में श्राद्ध करने से प्रभाव क्षेत्र में वृद्धि होती है ।

16 . मूल नक्षत्र में श्राद्ध करने से जातक को निरोगिता और दीर्घ आयु प्राप्त होती है ।

Vashikaran Mantra to Control in Laws

Vashikaran Mantra to Control in Laws – ससुराल में नियंत्रण के लिए वशीकरण मंत्र इन हिंदी


Vashikaran Mantra to Control in Laws

सास आप को प्यार करें. ससुर बेटी की तरह माने. जेठ-देवर आप का सम्मान करे और ननद के साथ आपके रिश्ते मधुर रहे ऐसे सुख इच्छा हर लड़की होती है.
गृहस्थ जीवन का सुख व्यक्ति आगे ही लेकर जाता है. परंतु परिवार में कलह व्यक्ति के जीवन में परेशानियां पैदा करता है.
ससुराल में जीवन को सुखमय एवं खुशहाल बनाने के लिए ज्योतिष में कुछ उपाए बताए गए हैं. उनमें से एक यह मारक उपाय है.
ससुराल में सुखी रहने के लिए कन्या अपने हाथ से हल्दी की साबुत गांठें, पीतल का एक टुकड़ा और थोड़ा-सा गुड़ ससुराल की ओर फेंक दें. ऐसा करने से ससुराल में सुख एवं शांति का वास रहता है.

और इसका लाभ को मिलना शुरू हो जाएगा.

सवा पाव मेहंदी के तीन पैकेट (लगभग सौ ग्राम प्रति पैकेट) बनाएं और तीनों या शस्त्र धारण किए हुए किसी देवी की मूर्ति वाले मंदिर में जाएं। वहां दक्षिणा, पत्र, पुष्प, फल, मिठाई, सिंदूर तथा वस्त्र के साथ मेहंदी के उक्त तीनों पैकेट चढ़ा दें। फिर भगवती से कष्ट निवारण की प्रार्थना करें और एक फल तथा मेहंदी के दो पैकेट वापस लेकर कुछ धन के साथ किसी भिखारिन या अपने घर के आसपास सफाई करने वाली को दें। फिर उससे मेहंदी का एक पैकेट वापस ले लें और उसे घोलकर पीड़ित महिला के हाथों एवं पैरों में लगा दें। पीड़िता की पीड़ा मेहंदी के रंग उतरने के साथ-साथ धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगी।

ससुराल में सुखी रहने के लिए

टोन टोटके के उपाय इन हिंदी इन वैदिक ज्योतिष, परिवार में सुख शांति के उपाय -, मेरी कलम से: ससुराल में सुखी रहने का मारक उपाए, ससुराल, ससुराल में सुखी रहने का मारक उपाए, ससुराल में सुखी रहने के लिए, साबर मन्त्रो से सफ़लता: परेशानियों को दूर भगाइये and tagged कुछ उपयोगी टोटके, टोन टोटके के उपाय इन हिंदी इन वैदिक ज्योतिष, परिवार में सुख शांति के उपाय -, मेरी कलम से: ससुराल में सुखी रहने का मारक उपाए, ससुराल, ससुराल में सुखी रहने का उपाय, ससुराल में सुखी रहने का मारक उपाए, ससुराल में सुखी रहने के लिए, साबर मन्त्रो से सफ़लता: परेशानियों को दूर भगाइये |

कन्या अपने हाथ से हल्दी की 7 साबुत गांठें, पीतल का एक टुकड़ा और थोड़ा-सा गुड़ ससुराल की तरफ फेंके, ससुराल में सुरक्षित और सुखी रहेगी।विवाह के पश्चात् हर लड़की और उसके माता – पिता की यही इच्छा रहती हैं कि उनकी लड़की अपने ससुराल में खुश रहे और उसे उसके ससुराल में किसी भी प्रकार की कोई परेशानी न हो, उसके घर में सुख – शांति बनी रहे और उसके ससुराल के सभी सदस्यों के साथ अच्छे सम्बन्ध बने और उसे दाम्पत्य जीवन का भी सुख मिल सके. लेकिन यदि आप भी शादी के बाद ससुराल में सुखी रहना चाहते हैं, स्वस्थ रहना चाहते हैं दाम्पत्य जीवन का सुख भोगना चाहते हैं तो नीचे लिखे उपाय को जरूर अपनाएँ

उपाय –

1.ससुराल में सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने के लिए तीनमेहंदी के खाली पैकेट लें और उसमें 100 – 100 ग्राम महेंदी भर लें.

2.अब काली माता के मन्दिर में जाएँ या एक ऐसी देवी के मंदिर में जाएँ जिन्होंने अपने हाथों में शस्त्र धारण कर रखे हो.

सम्मोहन साधना

संभोग वशीकरण


क्या होता है संभोग वशीकरण?
संभोग वशीकरण एक तांत्रिक विधि है जिसमे कुछ विशिष्ट वशीकरण मंत्रों और अनुष्ठान द्वारा मनचाही स्त्री, प्रेमिका या पत्नी का वशीकरण किया जाता है l संभोग वशीकरण का मुख्य मकसद संभोग करना होता है l संभोग वशीकरण का प्रयोग कभी भी गलत मकसद के लिए नहीं किया जाता चाहिए l यदि आप किसी स्त्री को चाहते हैं और आपकी इक्षा है की वह स्त्री आपको भी चाहे और बिना ज़ोर जबर्दस्ती के संतुष्ट करे तो संभोग वशीकरण एक अचूक वशीकरण उपाय है l

कैसे करते हैं संभोग वशीकरण?
संभोग वशीकरण हेतु आप दो तरीके अपना सकते हैं! पहला तरीका यह है की आप निम्नलिखित मंत्र जाप विधि पूर्वक और पूर्ण विश्वास के साथ करें और दूसरा तरीका यह है की आप आचार्या शैलेंद्र शास्त्री जी के द्वारा संभोग वशीकरण अनुष्ठान करवाएँ और जल्द परिणाम प्रपट करे लें l

क्या संभोग वशीकरण मंत्र का प्रयोग सिर्फ स्त्री के लिए होता है?

नहीं, संभोग वशीकरण मंत्र का प्रयोग आप स्त्री या पुरुष किसी का भी वशीकरण करने के लिए कर सकते हैं l हमने जो संभोग हेतु वशीकरण मंत्र सुझाया है वो स्त्री और पुरुष दोनों पर उत्तम प्रभाव डालता है l

संभोग वशीकरण मंत्र (जब स्त्री पहले से आपके संपर्क मे हो) –
“ऐं भग भुगे भगनी भागोदारी भागमाले यौनि

भगनिपतिनी सर्वा भग संकरी भगरूपे नित्या क्लें

भग स्वरूपे सर्वा भगानी मे वशमानय वरदेरेते

सुरेते भग लिंकने क्लीं न द्रवये क्लेदय द्रवय

अमोघे भग विघे क्षुम क्षोमय सर्वा सत्वामगेशवरी

ऐं लंक जं ब्लूं मै माओ ब्लूं हे हे मिलने सरवामी भगानी तस्मै स्वाहा”

विधि – घी का दीपाक जलाकर इक्कीस दिनो तक 1186 दफा प्रतिदिन एक मंत्र का जाप करें तथा 108 मंत्रों से आहुती देकर मंत्र सिद्ध कर लें l तत्पश्चात आवश्यकता पड़ने पर इक्कीस दफा इस मंत्र का जाप करके जिस किसी भी स्त्री से नजर मिलायेंगे वही आपके वशीभूत होती l यह मंत्र तब और अधिक प्रभाव डालता है जब स्त्री आपके पहले से साथ रहती हो या आपके संपर्क में हो l

संभोग वशीकरण मंत्र जब स्त्री आपसे दूर रहती हो या संपर्क में ना हो –
“फूल फूल फूल ll

कुमारी रानी ll

पल – पल में आवो ll

शीघ्र वशमानी ll

यह फूल मंत्र ll

पढ़ूँ “अमुकी” जान ll

जगत ईश्वर ll

नरसिंघ वरदान ll

या फूल पढ़ी ll

देऊ अमुकी माथा ll

हमें छोड़ न ll

दूसरे के साथ ll

अल्लाह कामरू ll

कामक्षा माई ll

अल्ला हाड़ी ll

दासी चंडी की दुहाई ll

विधि – सर्वप्रथम दस हज़ार दफा के मंत्र का जाप अमावस्या की रात्रि को करके सिद्ध करें l फिर इस मंत्र में जहां “अमुकी” शब्द आया है, उस स्थान पर स्त्री का नाम लें l इस वशीकरण मंत्र का साधारणतः 21 दिन में परिणाम मिल जाता है l स्त्री संभोग के लिए व्याकुल हो जाती है l

Featured Online vashikaran Mantra and totke for husband vashikaran

Online vashikaran Mantra and totke for husband vashikaran


Every wife wants to live a happy married life with her husband but sometimes the situation becomes worse that she can not handle it on her own. In that situation, a famous and genuine husband vashikaran specialist can help you to make your relation with your husband happy forever. If you want to make your husband agree on your decision then also Vashikaran is a very powerful tool. There can be several issues in a married life such as if Husband is high tempered and you want that he should always be sweet toward you then Vashikaran Mantras can make you sweet for you forever. If you have doubt or if you are sure about any extramarital affair of your husband then also Vashikaran of husband by vashikaran specialist acharya Ji can help you in breaking and stopping your husband from involving in extramarital affairs.

If your husband always listens to his parents and relatives and do not give you proper attention and value then also Vashikaran mantras on husband will make him under your control and make him dance at your tune only. If your in-laws are making your husband behave against you then also vashikaran can help you. Overall Vashikaran can help you to make your married life happy forever without any tension. The best thing if you get the vashikaran done on your husband by Acharya Ji is that you can lifetime solution in one ritual only. You need not get the ritual/puja reperformed each time.

If you want to leave your in-laws and want your husband to live at another place with you then also Vashikaran can make his mind to decide that. Convincing your husband to live separately from his parents can make him angry can make family environment totally against you but if you take help of Vashikaran mantras and products then Your husband will be happily ready to live in separate accommodation with you and also your in-laws will not have any objection in your and husband’s decision.

If you have any extramarital affair and you are in fear that if your husband or inlaws got to know about that then your life will be destroyed then, in that case, Vashikaran of your husband and other family members will keep then unaware of the fact and if at any point of time they got to know about that then also they will not have any objection. They will keep their mouth shut and will be sweet toward you always.